Abstract
समकालीन शिक्षा प्रणाली तीव्र सामाजिक, आर्थिक, तकनीकी एवं सांस्कृतिक परिवर्तनों के प्रभाव में निरंतर परिवर्तनशील है। शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन तक सीमित न होकर व्यक्तित्व निर्माण, नैतिक विकास तथा सामाजिक उत्तरदायित्व के बोध को विकसित करना भी है। किंतु वर्तमान परिदृश्य में यह स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है कि शिक्षा व्यवस्था में नैतिक मूल्यों का निरंतर क्षरण हो रहा है। प्रतिस्पर्धा-प्रधान शिक्षा, उपभोक्तावाद, शिक्षा का व्यवसायीकरण, डिजिटल एवं सोशल मीडिया का प्रभाव तथा परिवार और समाज की बदलती संरचना ने मूल्य-आधारित शिक्षा को हाशिए पर धकेल दिया है।
प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य समकालीन शिक्षा प्रणाली में नैतिक मूल्यों के क्षरण के प्रमुख कारणों की पहचान करना, इसके विद्यार्थियों, समाज एवं राष्ट्र पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण करना तथा इस संकट से उबरने हेतु व्यावहारिक एवं नीतिगत समाधानों का सुझाव देना है। यह अध्ययन विश्लेषणात्मक एवं वर्णनात्मक पद्धति पर आधारित है, जिसमें शैक्षिक दार्शनिकों के विचारों, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, तथा पूर्ववर्ती शोध अध्ययनों का समालोचनात्मक अध्ययन किया गया है।
अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि मूल्य-विहीन शिक्षा के कारण विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता, असहिष्णुता, नैतिक निर्णय क्षमता की कमी तथा केवल भौतिक सफलता पर केंद्रित दृष्टिकोण विकसित हो रहा है। समाज में सामाजिक विघटन, आपसी अविश्वास और नैतिक पतन की प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं। शोध निष्कर्ष यह भी दर्शाते हैं कि यदि शिक्षा को मूल्य-आधारित दृष्टिकोण से पुनर्संरचित नहीं किया गया, तो मानवता, सामाजिक संतुलन और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है। अतः शिक्षा में नैतिक मूल्यों का पुनर्स्थापन समय की अनिवार्य आवश्यकता है।
Keywords
नैतिक मूल्य, समकालीन शिक्षा, मूल्य-क्षरण, शिक्षा प्रणाली, नैतिक शिक्षा
Author Affiliations
उत्कर्ष फाउण्डेशन, गोण्डा
