Abstract
प्रस्तुत शोध पत्र में बौद्ध दर्शन के एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं केन्द्रीय सिद्धांत प्रतीत्य समुत्पाद (द्वादश निदान) का दार्शनिक तथा शैक्षिक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण किया गया है। बौद्ध दर्शन के अनुसार संसार की प्रत्येक वस्तु एवं घटना कारणदृकार्य संबंध पर आधारित होती है और कोई भी तत्व स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में नहीं होता। यह सिद्धांत जीवन के यथार्थ स्वरूप को स्पष्ट करते हुए यह प्रतिपादित करता है कि मानव जीवन में विद्यमान दुःखों का मूल कारण अज्ञान (अविद्या) एवं तृष्णा है।
इस शोध पत्र में प्रतीत्य समुत्पाद की बारह कड़ियों अविद्या, संस्कार, विज्ञान, नामरूप, षडायतन, स्पर्श, वेदना, तृष्णा, उपादान, भव, जाति तथा जरामरणकृका क्रमबद्ध एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इसके माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि किस प्रकार ये कड़ियाँ परस्पर संबद्ध होकर जन्मदृमरण के चक्र (भवचक्र) को संचालित करती हैं तथा मानव को दुःख के बंधन में रखती हैं। इसके अतिरिक्त, शोध पत्र में इस सिद्धांत के दार्शनिक महत्व का विवेचन करते हुए यह दर्शाया गया है कि यह शाश्वतवाद एवं उच्छेदवाद दोनों का खंडन कर मध्यम मार्ग का प्रतिपादन करता है तथा आगे चलकर शून्यवाद के विकास का आधार बनता है।
शैक्षिक दृष्टिकोण से प्रतीत्य समुत्पाद का विशेष महत्व है। यह सिद्धांत शिक्षा को तार्किकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं कारणदृपरिणाम की समझ प्रदान करता है। साथ ही यह विद्यार्थियों में आत्मविश्लेषण, नैतिकता, उत्तरदायित्व तथा कर्मप्रधान जीवन-दृष्टि का विकास करता है। इस प्रकार यह शिक्षा को केवल ज्ञानार्जन तक सीमित न रखकर उसे जीवनोपयोगी, मूल्यपरक एवं व्यवहारिक बनाता है। अतः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि प्रतीत्य समुत्पाद न केवल बौद्ध दर्शन का मूल आधार है, बल्कि आधुनिक शिक्षा में भी इसकी प्रासंगिकता अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मानव जीवन को यथार्थ, नैतिक एवं संतुलित दृष्टि प्रदान करता है।
Keywords
बौद्ध दर्शन, प्रतीत्य समुत्पाद, द्वादश निदान, शिक्षा, नैतिकता, कर्म
Author Affiliations
शोध-छात्र, शिक्षा संकाय,
सनराइज विश्वविद्यालय, राजस्थान
