Abstract
वर्तमान युग में ऊर्जा मानव जीवन, औद्योगिक उत्पादन, कृषि विकास तथा सामाजिक प्रगति का मूल आधार बन चुकी है। आधुनिक सभ्यता के लगभग सभी क्षेत्रोंकृउद्योग, परिवहन, संचार, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं घरेलू गतिविधियोंकृका संचालन ऊर्जा पर निर्भर है। जनसंख्या में तीव्र वृद्धि, शहरीकरण, औद्योगिकीकरण तथा तकनीकी विस्तार के कारण ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है। दूसरी ओर, परंपरागत ऊर्जा स्रोत जैसे कोयला, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस सीमित और अनवीकरणीय हैं। इनके अत्यधिक दोहन से वायु प्रदूषण, वैश्विक तापवृद्धि, जलवायु परिवर्तन तथा पर्यावरणीय असंतुलन जैसी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।
इन परिस्थितियों में ऊर्जा संरक्षण तथा वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का विकास और उपयोग अत्यंत आवश्यक हो गया है। ऊर्जा संरक्षण का तात्पर्य ऊर्जा के विवेकपूर्ण, दक्षतापूर्ण एवं मितव्ययी उपयोग से है, जिससे समान कार्य कम ऊर्जा में संपन्न किया जा सके। वहीं वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों में सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जैव ऊर्जा, जलविद्युत, भू-तापीय ऊर्जा तथा ज्वारीय ऊर्जा प्रमुख हैं, जो नवीकरणीय, पर्यावरण-अनुकूल तथा दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा प्रदान करने वाले स्रोत हैं।
प्रस्तुत अध्ययन में ऊर्जा संरक्षण की अवधारणा, इसकी आवश्यकता, विभिन्न क्षेत्रों में अपनाए जाने वाले संरक्षण उपायों तथा वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की उपयोगिता का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है। साथ ही भारत में नवीकरणीय ऊर्जा के विकास, सरकारी नीतियों एवं चुनौतियों पर भी विचार किया गया है। अध्ययन से यह निष्कर्ष प्राप्त होता है कि ऊर्जा संरक्षण एवं नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का व्यापक उपयोग न केवल पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण में सहायक है, बल्कि आर्थिक विकास, ऊर्जा आत्मनिर्भरता, रोजगार सृजन तथा सतत विकास के लक्ष्यों की प्राप्ति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अतः वर्तमान एवं भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित, स्वच्छ और सतत ऊर्जा भविष्य सुनिश्चित करने हेतु ऊर्जा संरक्षण एवं वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को प्राथमिकता देना समय की अनिवार्य आवश्यकता है।
Keywords
ऊर्जा संरक्षण, वैकल्पिक ऊर्जा, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जैव ऊर्जा, सतत विकास।
Author Affiliations
सदस्य, सलाहकार मण्डल
