Abstract
भारतीय चिंतन परंपरा में शिक्षा को केवल ज्ञानार्जन अथवा रोजगार प्राप्त करने का साधन नहीं माना गया है, बल्कि इसे व्यक्ति के सर्वांगीण विकास तथा समाज और राष्ट्र के निर्माण का महत्वपूर्ण माध्यम माना गया है। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में विज्ञान, तकनीकी एवं व्यावसायिक दक्षताओं पर विशेष बल दिया जा रहा है, किंतु इसके साथ ही नैतिक मूल्यों, सामाजिक उत्तरदायित्व, सांस्कृतिक चेतना और मानवीय संवेदनाओं के विकास की आवश्यकता भी निरंतर अनुभव की जा रही है। ऐसी स्थिति में भारतीय चिंतन परंपरा के उन विचारों की प्रासंगिकता बढ़ जाती है जो मनुष्य के समग्र विकास को शिक्षा का आधार मानते हैं।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित ‘एकात्म मानववाद’ इसी प्रकार का एक भारतीय चिंतन है। ‘एकात्म’ का अर्थ है—समग्रता या एकीकरण। यह दर्शन व्यक्ति और समाज, मनुष्य और प्रकृति, तथा भौतिक और आध्यात्मिक जीवन को परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक मानता है।
दीनदयाल उपाध्याय का मानना था कि पूँजीवाद व्यक्ति की आर्थिक स्वतंत्रता पर और साम्यवाद वर्ग-संघर्ष व राज्य नियंत्रण पर अधिक बल देते हैं, जबकि दोनों में मनुष्य का समग्र स्वरूप पूर्ण रूप से सामने नहीं आता। इसके अनुसार मनुष्य केवल शरीर नहीं है; उसके विकास के लिए शरीर के साथ मन, बुद्धि और आत्मा का भी संतुलित विकास आवश्यक है। एकात्म मानववाद मनुष्य को केवल आर्थिक अथवा भौतिक आवश्यकताओं वाले प्राणी के रूप में नहीं देखता, बल्कि उसके शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के समन्वित विकास पर बल देता है। इसी कारण शिक्षा के क्षेत्र में एकात्म मानववाद को ऐसे दृष्टिकोण के रूप में देखा जा सकता है जो ज्ञान, कौशल, चरित्र, नैतिकता, संस्कृति और सामाजिक दायित्व को परस्पर जोड़ता है।
Keywords
वर्तमान परिप्रेक्ष्य, विद्यार्थी, एकात्म मानववाद, परामर्श, समग्र प्रक्रिया, मार्गदर्शन ।
Author Affiliations
सहायक आचार्य, शिक्षक शिक्षा विभाग, शक्ति स्मारक संस्थान दुल्हिनपुर,
बलरामपुर (उत्तर प्रदेश)
